Wednesday, November 25, 2009

या तोह हम इतिहास को मान लें या इतिहास को पूरी तरह ही नकार दें, हम खुद ही नहीं जानते के हम को करना क्या है या हम को किस की बात पर यकीन कर न है हम उन भेड़ों की तरह हैं जिन को एक ही लकड़ी से हंकल दिया जाता है और जिस तबेले मैं चाहते हैं उस मैं ही बंद कर दिया जाता है ,दो दिन पहले अंग्रेजी अख़बार मैं लिब्राहन रिपोर्ट को छापा गया, जिस मैं यह कहा गए हैं की अडवानी , अटल बिहारी वाजपयी और मुरली मनोहारी जोशी को बाबरी मस्जीद को गिराने का ज़िम्मेदार माना गया है , जिस की वजह से संसद मैं हंगामा मचा रहा और पुरे देश मैं, हडकंप मच गया पुरे देश की ही राजनीती मैं बिलकुल ही नई लहरें उठने लगी, इतिहास कहता है की, " बाबरी मस्जीद " को बाबर ने १६वीं शताब्दी मैं बनवाया था जिस को हम आज भी मानते हैं ,के (बाबरी मस्जीद) बाबर ने ही बनवाई थी,अगर हम " श्री राम " के जनम इस्थान के बारे मैं जानने के लिए इतिहास मैं जायंगे तोह हम को सिर्फ एक ही जवाब मिलेगा और वोह है " अयोध्या शहर " जिस शहर मैं " श्री राम " का जनम हुआ, जिस जमीन पर बाबरी मस्जीद बनी है उस ही जगह श्री राम ने जनम लिया ऐसा कहीं नहीं मिलता, क्योंकी अब यह भी इतिहास ही कह रहा है ,श्री राम का जनम तोह १० जनवरी ५११४ इस पूर्व हुआ था, यह बात तब सामने आई जब सरोज बाला, आई. आर. एस, (कमिश्नर ऑफ़ ईनकम टैक्स ) ने यह दावा किया की जो वोह कह रही हैं, उस के सबूत भी उनके पास मौजूद हैं , यह खबर टाईम्स नेटवर्क ने ८ नवम्बर २००३ मैं छापी, खेर यह तोह हुई इतिहास की बातें, कहानी सिर्फ इतनी सी है की राजनीती हर चीज़ पर भरी है चाहे वोह इतिहास हो या कोई धरम हो, और वोह कोई भी धरम के लोग हो, हिंदू, मुसलिम, सिख, या ईसाई , जहाँ राजनीती मैं रोटियां सकने की बात अति है तोह सरे ही धार्मिक लोग धरम को ताख मैं रख कर अपने अपने भाविशेये और अपनी आने वाली १६ पुच्तों के भविष को सवारने मैं लग जाते हैं, फिर चाहे वोह मुसलिम नेता ही क्यों न हों जो आतंकवादी बना कर जिन्हें जीहाद के नाम पर लड़ाया जाता है और उनके हाथों बेगुनाहों को बिन मांगे मौत दे दी जाती है, फिर वोह सिख नेता हों जो अपनी राजनीती के लिए दंगा कर दें, फिर चाहे वोह हिंदू नेता हों जो अपनी कुर्सी की चाहत मैं देश को ही दो टुकड़ों मैं करने पर उतारू हो जाएँ, अप इतिहास उठा कर देख ली जिए अप को कहीं भी किसी भी दंगे मैं किसी भी जंग मैं किसी भी लड़ाई मैं कोई नेता लड़ता हुआ नज़र नहीं आयेगा, दरअसल हम इन लगों के हाथों की कटपुतली हैं , यह अपने आलीशान बंगलों मैं बेठ कर सिर्फ हम पर हुकुम चला ते हैं , और हम बेवकूफ सिर्फ इन के हुकुम की तामील करते हैं, हमरे मुल्क का कानून इतना लाचार हैं की एक की एक ही मुल्क के मराठी अपने ही मुल्क के बिहारियों को जानवरों की तरह मरकर अपने प्रदेश से बहार कर देते हैं, और हमारे देश का कानून इस को आंख बंद कर देखता रहता है, जिस मानवता की बात हम करते हैं अगर आज उस मानवता को हम हिंदुस्तान मैं कहीं धोंडने े निकलेंगे तोह एक दुसरे के सिवा नफरत के और कुछ नहीं मिलेगा हम क्यों अपने आप से लड़ रहे हैं यह हम खुद ही नहीं जानते , किसी ने कहा है ( जम्हूरियत को तोला नहीं जाता गीना जाता है ) जिस दिन यह बात हमारी समझ मैं आयगी शायद तब तक हम जम्हूरियत का मतलब ही भोल चुके होंगे.

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